गोरों के मुकाबले अश्वेत कोरोना पीड़ितों की मौत का आंकड़ा दोगुना, संक्रमण का सबसे कम खतरा बांग्लादेशियों को

  • इंग्लैंड नेशनल हेल्थ सर्विसेज के अस्पतालों के मुताबिक, कोरोना के संक्रमण का सबसे ज्यादा खतरा अश्वेतों को
  • आंकड़ों के मुताबिक, एक हजार लोगों पर 63 कैरेबियाई लोगों की मौत, वहीं संक्रमण का सबसे कम खतरा बांग्लादेशियों को
  • विशेषज्ञों का कहना है गोरों के मुकाबले अश्वेत अधिक गरीब, ये जिस क्षेत्र में काम कर रहे वहां संक्रमण का खतरा अधिक

लंदन. इंग्लैंड में कोरोनावायरस से जुड़े सरकारी आंकड़े नई कहानी कह रहे हैं। नेशनल हेल्थ सर्विसेज (एनएचएस) के अस्पतालों के मुताबिक, ब्रिटेन में कोरोनावायरस के संक्रमण और मौत का सबसे ज्यादा खतरा अश्वेत, एशियाई और अल्पसंख्यकों को है। संक्रमण के जो मामले सामने आए हैं उसमें ये ट्रेंड देखने को मिला है। अस्पतालों से जारी आंकड़ों के मुताबिक, गोरों के मुकाबले अश्वेतों में संक्रमण के बाद मौत का आंकड़ा दोगुना है। अश्वेत, एशियाई और अल्पसंख्यकों को यहां बेम (BAME) कहते हैं जिसका मतलब है- ब्लैक, एशियन एंड माइनॉरिटी एथनिक। 

एक हजार लोगों पर 23 ब्रिटिश और 43 अश्वेत लोगों की मौत
आंकड़े सामने आने के बाद सरकार ने इस असमानता की वजह समझने के लिए जांच शुरू कर दी है। ‘द टाइम्स’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, एनएचएस के अस्पतालों ने जो आंकड़ा जारी किया है उसके मुताबिक, 1 हजार लोगों पर 23 ब्रिटिश, 27 एशियन और 43 अश्वेत लोगों की मौत हुई है। एक हजार लोगों पर 69 मौतों के साथ सबसे ज्यादा खतरा कैरेबियाई लोगों के लिए हैं, वहीं सबसे कम खतरा बांग्लोदेशियों (22) को है। 

कोरोना नस्लभेद के ऐसे मामले दूसरे देशों में भी
स्थानीय मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, ब्रिटेन में रह रहे कैरेबियाई मूल के लोग लगभग हर क्षेत्र में हैं। ये ज्यादातर होम वर्कर, बस ड्राइवर, चर्च लीडर, नर्स और कलाकार हैं। बेम कम्युनिटी में बढ़ते मौत के मामले में इंग्लैंड अकेला देश नहीं है। स्वीडन की कुल आबादी का 5 फीसदी संक्रमण वहां रह रहे सोमानिया के अश्वेत लोगों को हुआ है। वहीं, शिकागो में कोरोना से अश्वेतों की होने वाली मौत का आंकड़ा 70 फीसदी है।

अश्वेत ऐसे क्षेत्र में काम कर रहे जहां संक्रमण का खतरा अधिक
ब्रिटेन के डॉ. नागपॉल के मुताबिक, जरूरी चीजों का अभाव एक सेहतमंद जीवन को प्रभावित करता है। अश्वेत अफ्रीकन और कैरेबियाई लोग गोरों से कहीं ज्यादा गरीब हैं। ये जिस तरह के प्रोफेशन में हैं वहां संक्रमण का खतरा भी अधिक है। आमतौर पर ये हेल्थ, सामाजिक मदद, ट्रांसपोर्ट, दुकानदार और पब्लिक सर्विस से जुड़े हैं। इनका काम ही ऐसा ही है अधिक सोशल डिस्टेंसिंग बनाना संभव नहीं हो पाता और संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है।

सरकार को दी समीक्षा करने की सलाह
मानव अधिकार आयोग के पूर्व प्रमुख ट्रेवर फिलिप्स के मुताबिक, आंकड़े काफी चौंकाने वाले हैं। अगर कोई ये मान रहा है कि कोरोनावायरस भेदभाव नहीं करता तो वो इंसान या तो आंकड़ों को ध्यान से नहीं देख रहा या हकीकत को स्वीकार नहीं करना चाहता। ट्रेवर फिलिप्स ने सरकार को इस मामले की समीक्षा करने की सलाह दी है।  

ऐसे समूह को पहचानकर उन्हें सुरक्षा देना जरूरी
एनएचएस के डायरेक्टर डॉ. हबीब नकवी का कहना है कि महामारी के बीच ब्लैक, एशियन एंड माइनॉरिटी एथनिक (बेम) कम्युनिटी की मौत आंकड़ा चिन्ताजनक है। इंग्लैंड चीफ मेडिकल ऑफिसर प्रो. क्रिस विट्टी के मुताबिक, यह समय ऐसे समूह को पहचानने का है जिससे सबसे ज्यादा खतरा है ताकि हम उन्हें सुरक्षित करने में मदद कर सकें। स्वास्थ्य विभाग के  प्रवक्ता ने कहा, हमने इंग्लैंड से जानकारी मांगी है कि कौन सी ऐसी वजह हैं जो वायरस के संक्रमण को बढ़ा सकती हैं। 

Source link